हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इस्लामी देशों के पिछड़ेपन के कारणों की पहचान समकालीन सुधारकों की एक साझा चिंता रही है, लेकिन इमाम ख़ुमैनी के विचार में यह मुद्दा केवल आर्थिक या राजनीतिक विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें संस्कृति और आत्मविश्वास में निहित हैं। वे प्रगति की बाधाओं का गहन विश्लेषण करते हुए मानते थे कि जब तक विकृत मानसिकता और बौद्धिक निर्भरता का सुधार नहीं किया जाएगा, तब तक कोई भी राजनीतिक परिवर्तन स्थायी और वास्तविक उन्नति का कारण नहीं बन सकता।

यह लेख — “इमाम ख़ुमैनी और आयतुल्लाह ख़ामेनेई के दृष्टिकोण से इस्लामी देशों के पिछड़ेपन के कारण” नामक पुस्तक (इस्लामी क्रांति दस्तावेज़ केंद्र द्वारा प्रकाशित) पर आधारित है — जिसका उद्देश्य इमाम ख़ुमैनी के वैचारिक ढांचे को पुनः पढ़ते हुए इस्लामी देशों के पतन के आंतरिक और बाहरी कारणों को स्पष्ट करना तथा इस ऐतिहासिक संकट से बाहर निकलने का मार्ग इस्लामी जागृति और एकता के आधार पर प्रस्तुत करना है।
अ) आंतरिक पतन के कारण
1- विकृत संस्कृति
इमाम ख़ुमैनी के विचारों के अध्ययन में ऐसा प्रतीत होता है कि “विकृत संस्कृति” (आंतरिक कारणों में) और “उपनिवेशवाद” (बाहरी कारणों में) उनके वैचारिक मॉडल के सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं, जिनके माध्यम से वे इस्लामी देशों के अविकास और पिछड़ेपन की व्याख्या करते हैं, क्योंकि उनके कथनों में पिछड़ेपन के विभिन्न रूप इन्हीं दो मूल अवधारणाओं से जोड़े गए हैं।
यद्यपि “विकृत संस्कृति” शब्द उनके भाषणों में सीधे रूप से मौजूद नहीं है, फिर भी उनके विचारों की सामग्री यह संकेत देती है कि पिछड़ेपन की जड़ मुसलमानों की विकृत मानसिकता में पाई जाती है। यह मानसिकता एक सामान्य सांस्कृतिक रूप में समाज की विभिन्न परतों में फैल गई है और उसने विकास के बौद्धिक और तकनीकी क्षेत्रों को उन्नति और प्रगति से दूर कर दिया है। वास्तव में, इमाम ख़ुमैनी के अनुसार विकृत संस्कृति उन आंतरिक समस्याओं का स्रोत है जिनसे पूरा इस्लामी जगत ग्रस्त है।
इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण से मुसलमानों की संस्कृति इसलिए संकट और पिछड़ेपन में है क्योंकि वह इस्लामी संस्कृति के मानक से भटक गई है। उनके अनुसार इस्लामी संस्कृति, यानी सीधा मार्ग, नबियों विशेषकर पैग़म्बर इस्लाम (स.) का मार्ग है, जबकि इसके विपरीत पश्चिमी और औपनिवेशिक संस्कृति को वे टेढ़ी और विकृत मानते हैं।
उनके अनुसार मुसलमानों पर हावी मानसिकता और संस्कृति इस्लाम तथा उसकी सभ्यता-निर्माण करने वाली शिक्षाओं से भटक चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम समाज ग़फ़लत, सुस्ती, ठहराव और बौद्धिक जड़ता का शिकार हो गया है।
2- कमजोर भ्रष्ट सरकारें
इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण से इस्लामी सरकारें विभिन्न कारणों से इस्लामी देशों के पतन और पिछड़ेपन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दूसरे शब्दों में, राजनीतिक ढाँचों पर काबिज़ एक छोटा और पतित शासक वर्ग इस्लामी समाजों को उन्नति और प्रगति से रोकता है। इस संदर्भ में वे शासक वर्ग की बीमार और पतित प्रवृत्तियों की ओर विशेष ध्यान दिलाते हैं, जैसे न्याय से भटकाव, महलों में रहने की प्रवृत्ति, दुनियादारी से लगाव और आत्म-प्रेम।
इस पतन का एक अन्य हिस्सा इस्लामी देशों के राजनीतिक तंत्रों की पुरानी और पिछड़ी संरचना से जुड़ा है। इमाम के दृष्टिकोण से राजशाही व्यवस्था राष्ट्रों के पिछड़ेपन और दुर्भाग्य का मुख्य कारण है, क्योंकि राजतंत्र और बादशाहत जनता से चुनाव का अधिकार छीन लेते हैं, अयोग्य लोगों को सत्ता सौंपते हैं और शासन को भय तथा बल के माध्यम से चलाते हैं। ऐसी पुरानी और जर्जर व्यवस्थाएँ स्वभावतः अक्षम होती हैं और अपने समाज को विकास और उन्नति की दिशा में आगे नहीं ले जा सकतीं।
3- निष्क्रिय धर्मगुरु वर्ग
इमाम ख़ुमैनी ने उन कारणों में, जो मुसलमानों के पतन का कारण बनते हैं, उलेमा और धर्मगुरुओं की भूमिका और प्रभाव पर विशेष ध्यान दिया है। इस संदर्भ में उनका सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि धर्मगुरुओं की राजनीतिक और सामाजिक मामलों में भागीदारी की इच्छा का अभाव है। उनके अनुसार धर्मगुरुओं का राजनीति में शामिल होना समाज के भाग्य के प्रति जागरूकता और सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक है। लेकिन पिछले कुछ सदियों में इस भागीदारी को कमज़ोर करने वाली सोच यह रही है कि धर्मगुरुओं को केवल मदरसों और मस्जिदों तक सीमित रहना चाहिए।
इस तरह समाज में प्रभावशाली धार्मिक नेतृत्व और विद्वानों की निष्क्रियता धीरे-धीरे आम जनता तक फैल जाती है, जिससे लोग भी सामाजिक समस्याओं और पिछड़ेपन के प्रति उदासीन हो जाते हैं। इमाम ख़ुमैनी के अनुसार, धर्म और राजनीति को अलग मानना और मुसलमानों के भविष्य के प्रति असंवेदनशीलता दिखाना ऐसी सोच है जिसे वे अत्यंत गलत और अनुचित मानते थे।
4- निर्भर बुद्धिजीवी
किसी भी समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका और विचारधारा में बदलाव लाने की शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। इमाम ख़ुमैनी के अनुसार बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं—धार्मिक बुद्धिजीवी और पश्चिम-प्रभावित बुद्धिजीवी—और दोनों ने इस्लामी दुनिया में सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन लाए हैं।
उनके अनुसार इस्लामी समाज के पतन और विचलन का एक कारण ऐसे बुद्धिजीवियों की मौजूदगी है जो पूर्व या पश्चिम की विचारधाराओं पर निर्भर हैं, जो अपने स्थानीय समाज से दूर होकर मुस्लिम जीवन की आवश्यकताओं और नियमों को ठीक से नहीं समझते। यह मानसिक और सांस्कृतिक निर्भरता उन्हें अपनी ही संस्कृति और क्षमताओं को कम आंकने पर मजबूर करती है और वे पश्चिमी सभ्यता के सामने आत्मसमर्पण की स्थिति में आ जाते हैं।
इमाम के अनुसार यह बौद्धिक और सांस्कृतिक पराधीनता इस स्तर तक पहुँच जाती है कि व्यक्ति अपनी ही राष्ट्रीय और धार्मिक विरासत को पिछड़ा और अविकसित मानने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि लोग बिना सोचे-समझे पश्चिमी या पूर्वी मॉडलों की नकल करने लगते हैं, बिना यह देखे कि वे उनके समाज और परिस्थितियों के लिए उपयुक्त हैं या नहीं।
5- आंतरिक एकता की कमजोरी
इमाम ख़ुमैनी के अनुसार इस्लामी समाजों की असफलता और पिछड़ेपन के मूल आधारों में से एक मतभेद, विभाजन और आंतरिक एकजुटता का अभाव है। उनके दृष्टिकोण से विभिन्न प्रकार की पार्टीगत, जातीय और वैचारिक सीमाएँ तथा आपसी विभाजन ऐसे संघर्ष और विवाद पैदा करते हैं जो समाज और राज्य दोनों को पतन की ओर ले जाते हैं। ऐसे वातावरण में यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि सामूहिक निर्णय लिए जाएँ और उन्हें पूरे समाज के हित में लागू किया जाए।
इसलिए इमाम वक्ताओं और धार्मिक मंचों से अपील करते हैं कि वे लोगों को एकता, आंदोलन की निरंतरता, ईश्वर-भय और क्रांतिकारी धैर्य की ओर बुलाएँ, और उन्हें विभाजन और तकरार से दूर रखें, क्योंकि यही पिछड़ेपन और हार की मूल वजह है। उनके अनुसार सभी प्रकार के भ्रष्टाचार और पतन के केंद्र में विभाजन और मतभेद हैं, जो मानव की स्वार्थी प्रवृत्तियों पर सवार होकर समाजों को विनाश की ओर ले जाते हैं। वास्तव में विभाजन वह साधन है जिसके माध्यम से बाहरी शत्रु इस्लामी देशों पर प्रभुत्व स्थापित करते हैं।
6- इस्लामी एकता का अभाव
इमाम ख़ुमैनी के अनुसार संप्रदायवाद और संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण, जैसे शिया-सुन्नी विभाजन और जातीय मतभेद, मुस्लिम समाजों की समस्याओं को और बढ़ा देते हैं। जबकि सभी नबियों का संदेश एकता और “रस्सी-ए-इलाही (हबलुल्लाह)” को मज़बूती से पकड़ने पर आधारित रहा है, और मुसलमानों को इससे अलग न होने का आदेश दिया गया है।
उनके अनुसार इस एकता को स्थापित करने के लिए सभी नेताओं, विद्वानों और विचारकों की गंभीर भागीदारी आवश्यक है। वे यह भी कहते हैं कि इस्लामी देशों की समस्याएँ केवल स्वयं उनके द्वारा ही हल की जा सकती हैं, लेकिन उन्हें एकता से दूर रखने का सबसे बड़ा कारण इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं से दूरी है।
उनके विचार में मुसलमानों ने एक ओर इस्लाम को केवल इबादत और दुआओं तक सीमित कर दिया है, और दूसरी ओर संप्रदायिक मतभेदों को बढ़ावा देकर इस्लाम की मूल एकता को नजरअंदाज़ कर दिया है, जिससे वे स्वयं अपने और अपने धर्म के नुकसान का कारण बन गए हैं।
इस्लामी देशों में विभाजन और असहमति वह मार्ग है जिसके माध्यम से उपनिवेशवादी शक्तियाँ, अपने सहयोगी एजेंटों और स्थानीय शासकों के साथ मिलकर, मुस्लिम देशों के संसाधनों और संपत्तियों का शोषण करती हैं। जबकि इतिहास में जब इस्लामी दुनिया एकजुट थी, तब उसने सभ्यता और महानता के उच्च स्तर को प्राप्त किया था, लेकिन बाद में विभाजन ने उसे उस ऊँचाई से वर्तमान स्थिति तक पहुँचा दिया, जिससे बाहरी शक्तियाँ उसके संसाधनों का लाभ उठा सकीं।
ब) पतन के बाहरी कारण
उपनिवेशवाद अपने पुराने और नए रूपों में, और आधुनिक मीडिया तथा संचार माध्यमों के साथ मिलकर, मध्य पूर्व और इस्लामी दुनिया में प्रारंभ से ही इस प्रयास में रहा है कि वह विकास की दिशा को पश्चिमी हितों के अनुसार नियंत्रित करे। इस प्रक्रिया में वह विकास के मूल तत्व—संस्कृति, संपत्ति और शासन—को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करता रहा है।
इस्लामी क्षेत्रों की भौगोलिक और सामरिक स्थिति तथा उनके विशाल तेल और गैस भंडार ने इन्हें उपनिवेशवाद के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दिया है। इसके परिणामस्वरूप निर्भर और पश्चिम-समर्थक सरकारों का निर्माण हुआ, उस्मानी साम्राज्य का पतन हुआ, और राजनीतिक संरचनाएँ उपनिवेशवादी हितों के अनुसार पुनर्गठित की गईं। साथ ही जातीय और धार्मिक संघर्षों के स्थायी केंद्र बनाए गए और फ़िलिस्तीन में कब्ज़ा करने वाला शासन स्थापित हुआ, जिसने मुस्लिम समाजों की ऊर्जा, समय और क्षमता को विकास से हटाकर आंतरिक संघर्षों में लगा दिया।
इमाम ख़ुमैनी के विचारों के अनुसार बाहरी कारणों में सबसे प्रमुख कारण उपनिवेशवाद है, जिसने इस्लामी देशों को उन्नति से दूर रखा है। उपनिवेशवादी शक्तियों की भौतिकवादी विचारधारा का उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है, चाहे वह मानव संसाधनों का शोषण हो या प्राकृतिक संसाधनों का।
इमाम के अनुसार उपनिवेशवादियों ने समाजों का गहन अध्ययन करके यह समझ लिया कि इस्लामी दुनिया में किस प्रकार प्रभाव स्थापित किया जा सकता है, और उन्होंने विकास की मानसिकता को विकृत करके लोगों की सोच को अपने हितों के अनुसार मोड़ दिया।
उनके अनुसार सांस्कृतिक प्रभुत्व के माध्यम से उपनिवेशवाद ने मुसलमानों के मन में एक प्रकार की “कृत्रिम नींद” उत्पन्न कर दी, जिससे वे अपने समाज की समस्याओं और हितों पर विचार करने में सक्षम न रह गए। इस नीति का मुख्य उद्देश्य यह था कि ऐसे मानव संसाधन तैयार न हों जो विकास में सहायक हों, इस्लामी शिक्षाएँ लागू न हो सकें, और ऐसे लोग तैयार हों जो मानसिक रूप से निर्भर हों और पश्चिम या पूर्व के अनुयायी बनकर कम लागत में उपनिवेशवादी हितों की सेवा करते रहें।
पतन से बाहर निकलने के उपाय
1- इस्लाम पर भरोसा
इमाम ख़ुमैनी की धार्मिक दृष्टि यह मानती है कि अनेक समस्याओं और कठिनाइयों का समाधान इस्लाम की शिक्षाओं को अपनाने में है, क्योंकि उनका विश्वास है कि इस्लाम मानवता को हर प्रकार के पिछड़ेपन से मुक्ति दिलाने में सक्षम है। उनके अनुसार इस्लाम एक व्यापक, सर्वांगीण और बहुआयामी कार्यक्रम है जो मनुष्य के सभी व्यक्तिगत और सामाजिक पहलुओं—चाहे वे भौतिक हों या आध्यात्मिक—पर पूर्ण नियंत्रण और मार्गदर्शन प्रदान करता है, और इसी के अनुसार उसने जीवन के संचालन के लिए नियम निर्धारित किए हैं।
2- राजनीतिक क्रांति और बुनियादी सुधार
चूँकि पतित और प्रतिक्रियावादी शासन इस्लामी दुनिया के सुधार और प्रगति में एक बड़ी बाधा हैं, इसलिए राजनीतिक क्रांति और गैर-जनतांत्रिक तथा इस्लाम-विरोधी संरचनाओं का उन्मूलन उन्नति के मार्ग में पहला कदम माना जाता है। फिर भी इमाम के अनुसार केवल राजनीतिक परिवर्तन से सभी समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं; वास्तविक विकास और प्रगति के लिए गहरे सुधार आवश्यक हैं, क्योंकि विकृत संस्कृति और पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित सोच को तुरंत बदला नहीं जा सकता।
3- सक्रिय और जागरूक भागीदारी
इमाम हमेशा समाज और राजनीति में जनता की सक्रिय और जागरूक भागीदारी पर जोर देते थे, ताकि लोग निष्क्रियता और उदासीनता से बाहर निकलकर इस्लामी समाज और अन्य मुस्लिम देशों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनें और सामूहिक रूप से एकता के साथ उनके समाधान के लिए प्रयास करें। उनके अनुसार जब तक जनता और सामाजिक संस्थाएँ निगरानी और भागीदारी नहीं करतीं, तब तक समाज में भ्रष्टाचार और पतन बढ़ता रहता है। इसलिए इस्लाम की रक्षा और सरकारों के विचलन को रोकना जनता की उपस्थिति और सक्रियता पर निर्भर है।
4- बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता
इमाम ख़ुमैनी के विचारों में सांस्कृतिक और बौद्धिक स्वतंत्रता का विशेष महत्व है। वे विदेशी और औपनिवेशिक संस्कृतियों से स्वतंत्रता पर जोर देते हुए इस्लामी समाजों की अपनी मूल संस्कृति को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं। वे ईरान की इस्लामी क्रांति को इसी लक्ष्य की दिशा में एक कदम मानते हैं।
उनकी बार-बार की गई चेतावनियाँ इस बात पर केंद्रित हैं कि पश्चिमी संस्कृति का व्यापक प्रभाव इस्लामी संस्कृति को कमजोर कर सकता है और उसे व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में हाशिये पर ले जा सकता है।
5- आत्मविश्वासी और जिम्मेदार मानव संसाधन का प्रशिक्षण
इमाम के दृष्टिकोण से परिवार और विशेष रूप से महिलाएँ, जो शिक्षा और मानव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, समाजों के उत्थान और पतन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वे सक्षम हैं कि एक जागरूक और साहसी पीढ़ी का पालन-पोषण करके समाज को पतन की स्थिति से बाहर निकाल सकें। इमाम के अनुसार निर्माणशीलता, विकास की भावना, काम करने की इच्छा और जिम्मेदारी की भावना मिलकर मौजूदा पिछड़ेपन को दूर कर सकती है। सामान्य रूप से इमाम प्रगति को जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ा मानते हैं, अर्थात हर व्यक्ति अपने स्थान और विशेषज्ञता के अनुसार मन लगाकर अपने कर्तव्यों का पालन करे।
6- आंतरिक एकता और संगठन
इमाम ख़ुमैनी हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि इस्लामी उम्मत का निर्माण और उसकी आंतरिक एकता तथा समन्वय को मजबूत किया जाए। उनका मानना था कि इस्लामी दुनिया की सफलता, दमन और शोषण से मुक्ति तथा पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सबसे बड़ा रहस्य मुस्लिम समाजों में एकता, सहयोग और आपसी समझ का निर्माण और संरक्षण है।
वे मानते थे कि यदि इस्लामी देशों के बीच एकता और एक स्वर स्थापित हो जाए तो इस्लामी दुनिया की समस्याओं के समाधान की आशा मजबूत हो जाती है। वे यह भी मानते थे कि मुस्लिम देशों के नेता अपने-अपने समाजों के दिलों को इस्लामी एकता की ओर मोड़ सकते हैं।
7- इस्लामी जागरूकता और चेतना का प्रसार
इमाम बार-बार इस बात पर जोर देते थे कि जागरूक और क्रांतिकारी तत्वों, विशेषकर इस्लामी विद्वानों, का कर्तव्य है कि वे अन्य मुसलमानों को जागरूक करें। पिछड़ेपन और पतन के कारणों को स्पष्ट करना, उन्हें अत्याचार और उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित करना, और उन्हें वास्तविक इस्लाम तथा एकता की ओर आकर्षित करना अत्यंत आवश्यक है।
इस प्रकार की चेतना का उदाहरण ईरान की इस्लामी क्रांति में देखने को मिलता है, और इमाम चाहते थे कि इस प्रकार के विचार और आंदोलन अन्य मुस्लिम देशों में भी फैलें और उनके माध्यम से इस्लामी दुनिया की समस्याओं का समाधान किया जाए।
स्रोतछ मेहराबी कोश्की, राज़िया (1400). इस्लामी देशों के पिछड़ेपन के कारण इमाम ख़ुमैनी और आयतुल्लाह ख़ामेनेई के दृष्टिकोण से, प्रथम संस्करण, तेहरान: इस्लामी क्रांति दस्तावेज़ केंद्र, पृष्ठ 86–145।
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